विदेश की स्थिर नौकरी छोड़कर मैंने केरल में बिज़नेस क्यों शुरू किया
कई सालों तक मैंने विदेश में काम किया। तनख़्वाह पक्की थी, काम की इज़्ज़त थी, और घरवाले जानते थे कि हर महीने वे मुझ पर भरोसा कर सकते हैं। हर महीने की पहली तारीख़ को पैसे घर भेजना, त्योहारों पर छुट्टी लेकर आना, और फिर वापस उसी रूटीन में लौट जाना। कागज़ पर देखें तो यह वही सब था जिसकी चाह केरल के किसी छोटे शहर के इंसान से की जाती है। लोग मेरी मिसाल देते थे, और मुझे भी लगता था कि ज़िंदगी सही दिशा में जा रही है।
लेकिन धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि स्थिरता और मालिकाना हक़ एक चीज़ नहीं हैं। मेरा हर प्रोजेक्ट, मेरी हर देर रात की मेहनत, मेरा हर नया आइडिया, किसी और की चीज़ खड़ी कर रहा था। कंपनी आगे बढ़ती थी, मुनाफ़ा बढ़ता था, लेकिन उसमें मेरा अपना कुछ नहीं था। रात को जब काम ख़त्म करके कमरे में लौटता, तो एक सवाल बार-बार मेरे मन में लौटता था: क्या मैं पूरी ज़िंदगी किसी और का सपना बनाने में ही बिता दूँगा? क्या दस-बीस साल बाद भी मैं यही सोचता रहूँगा कि “काश, मैंने कोशिश की होती”?
क्या मैं पूरी ज़िंदगी किसी और का सपना बनाने में ही बिता दूँगा?
उसी दौरान जब भी मैं छुट्टियों में घर आता, अपने आस-पास के दुकानदारों को देखता। कोई मोटे रजिस्टर में हाथ से हिसाब लिख रहा होता, कोई बिल बनाने में दस-दस मिनट लगाता, तो कोई महीने के आख़िर में यह समझ ही नहीं पाता कि कौन-सा सामान ख़त्म हो गया और कौन-सा गोदाम में पड़ा-पड़ा ख़राब हो रहा है। जो सॉफ़्टवेयर बाज़ार में थे, वे या तो बहुत महँगे थे, या इतने पेचीदा कि एक आम दुकानदार उन्हें चला ही नहीं सकता था। मुझे लगा — यह समस्या असली है, और इसे वही हल कर सकता है जो इन लोगों को सच में समझता हो।
यह समस्या असली है, और इसे वही हल कर सकता है जो इन लोगों को सच में समझता हो।
इसलिए मैंने फ़ैसला किया और बिज़नेस शुरू करने के लिए केरल लौट आया। मेरे पास न कोई निवेशक था, न कोई बड़ी योजना, और न ही इस बात की कोई गारंटी कि यह चलेगा। दोस्तों और रिश्तेदारों ने पूछा कि इतनी अच्छी नौकरी छोड़कर इतनी अनिश्चित राह क्यों चुन रहे हो। कुछ ने तो खुलकर कहा कि यह पागलपन है। मेरे पास हमेशा कोई ठोस जवाब नहीं होता था। मेरे पास बस एक विश्वास था — कि एक छोटे शहर का इंसान भी ऐसा कुछ बना सकता है जो हज़ारों लोगों के काम आए।
शुरुआती दिन बहुत मुश्किल थे। कई महीने ऐसे थे जब पैसों की तंगी रही, और बचत तेज़ी से ख़त्म होती जा रही थी। कई दिन ऐसे भी आए जब कोई ग्राहक नहीं मिला, जब सॉफ़्टवेयर में कोई बग पूरी रात जगाए रखता, और जब मन में यह डर बैठ जाता कि कहीं मैंने ग़लती तो नहीं कर दी। मैं ख़ुद दुकान-दुकान जाकर डेमो दिखाता, लोगों की शिकायतें सुनता, और रात को लौटकर उन्हीं के हिसाब से सॉफ़्टवेयर में बदलाव करता। हर “ना” ने मुझे कुछ सिखाया, और हर “हाँ” ने आगे बढ़ने की हिम्मत दी।
हर “ना” ने मुझे कुछ सिखाया, और हर “हाँ” ने आगे बढ़ने की हिम्मत दी।
लेकिन हर वह दुकानदार जिसकी बिलिंग तेज़ हुई, हर वह रिटेलर जिसे पहली बार अपने स्टॉक की सही जानकारी मिली, हर वह छोटा व्यापारी जिसने पहली बार बिना किसी झंझट के GST इनवॉइस बनाया — उन सबने मुझे याद दिलाया कि मैं घर क्यों लौटा था। जब कोई ग्राहक फ़ोन करके कहता कि “अब मेरा काम आधे समय में हो जाता है,” तो वह किसी भी तनख़्वाह से बड़ा इनाम लगता था। भारत के छोटे व्यापारियों को ऐसे टूल चाहिए जो आसान हों, किफ़ायती हों, और उन लोगों के बनाए हों जो उनकी ज़मीनी हक़ीक़त को समझते हैं।
अब मेरा काम आधे समय में हो जाता है।
यही विश्वास आगे चलकर रेनटेक सॉफ़्टवेयर लिमिटेड बना, और फिर रिटेल डैडी — केरल के कोच्चि में बना बिलिंग, GST इनवॉइसिंग, इन्वेंटरी और बारकोड सॉफ़्टवेयर। जो सफ़र एक कमरे और एक लैपटॉप से शुरू हुआ था, आज उस पर पूरे भारत में 1.5 लाख से ज़्यादा व्यवसाय भरोसा करते हैं। किराना स्टोर से लेकर कपड़ों की दुकान तक, मेडिकल स्टोर से लेकर सुपरमार्केट तक — हर दिन हज़ारों बिल रिटेल डैडी पर बनते हैं।
पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो जो फ़ैसला उस वक़्त जोखिम भरा लगा था, वही सही निकला। वहीं रुके रहना ज़्यादा बड़ा जोखिम होता — यह कभी न जान पाने का जोखिम कि मैं क्या बना सकता था। आज भी जब कोई युवा मुझसे पूछता है कि क्या उसे अपनी स्थिर नौकरी छोड़कर कुछ अपना शुरू करना चाहिए, तो मैं यही कहता हूँ — सोच-समझकर फ़ैसला लो, मेहनत के लिए तैयार रहो, लेकिन डर को अपने सपने का फ़ैसला मत करने दो।
सबसे सुरक्षित रास्ता हमेशा सही रास्ता नहीं होता।
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