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विदेश के वो साल | Retail Daddy

विदेश के वो साल

लोग अक्सर सोचते हैं कि हर फाउंडर के पास पहले दिन से कोई बड़ी योजना होती है। कोई बिज़नेस प्लान, कोई निवेशक, कोई सपना जो कागज़ पर लिखा हो। मेरे पास ऐसा कुछ नहीं था।

डिप्लोमा के बाद विदेश जाता एक युवा

मेरे पास था एक डिप्लोमा, एक छोटा सा बैग, और घर वालों की उम्मीदें।

डिप्लोमा के बाद मैं काम करने विदेश गया। एयरपोर्ट पर माँ ने जो आख़िरी बात कही थी, वो आज भी याद है:

“बेटा, जो भी काम मिले, ईमानदारी से करना।”

तब मुझे नहीं पता था कि यही बात मेरी पूरी कहानी बन जाएगी।

मैंने वो नौकरियाँ कीं जो उपलब्ध थीं, वो नहीं जिनका मैंने सपना देखा था।

पासपोर्ट, बोर्डिंग पास और डिप्लोमा
विदेश में काम के दिन

ऐसी नौकरियाँ जिन्हें कोई शानदार नहीं कहेगा

उन सालों में मैंने कई नौकरियाँ कीं। उनमें से कोई भी शानदार नहीं थी। कुछ का तो मेरी पढ़ाई से बहुत कम लेना-देना था।

सुबह जल्दी उठना, भीड़ भरी बस में काम पर जाना, और रात को थककर एक छोटे से कमरे में लौटना, जहाँ चार-पाँच लोग साथ रहते थे। वहाँ सबकी कहानी लगभग एक जैसी थी: घर से दूर, घर के लिए।

महीने के अंत में जब सैलरी आती, तो सबसे पहला काम होता घर पैसे भेजना। फिर फ़ोन पर घर वालों की आवाज़ सुनना और कहना, “सब ठीक है, चिंता मत करो।” भले ही उस दिन पैर दर्द से टूट रहे हों।

उस समय यह महसूस करना आसान था कि मैं अपना डिप्लोमा बर्बाद कर रहा हूँ। कई रातें मैंने छत की ओर देखते हुए सोचा: क्या इसी के लिए पढ़ाई की थी? यह सब आख़िर कहाँ जा रहा है?

मैं असल में क्या सीख रहा था

लेकिन धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि मैं सिर्फ़ काम नहीं कर रहा था। मैं देख रहा था। हर नौकरी ने मुझे दिखाया कि असली बिज़नेस कैसे चलते हैं।

स्टॉक कैसे घूमता है।

क्या जल्दी बिकता है, क्या शेल्फ़ पर पड़ा रहता है, और क्या चुपचाप नुकसान बन जाता है। मैंने देखा कि कैसे एक्सपायरी डेट निकल जाने पर पूरा डिब्बा फेंकना पड़ता था, और मालिक का चेहरा उतर जाता था।

बिल कैसे बनते हैं।

काउंटर पर भीड़, हाथ से लिखे बिलों में गलतियाँ, हिसाब-किताब में बर्बाद होता समय। लाइन में खड़ा ग्राहक घड़ी देखता, और कैशियर पसीने में जोड़-घटाव करता रहता।

मालिक कैसे चिंता करते हैं।

मैंने मालिकों को हर रुपये और हर दिरहम की चिंता करते देखा, क्योंकि छोटे बिज़नेस में हर सिक्का मायने रखता है।

एक रात की बात मुझे आज भी याद है। दुकान बंद हो चुकी थी, लाइटें आधी बुझ चुकी थीं, और मालिक काउंटर पर बैठे तीसरी बार कैश गिन रहे थे। हिसाब में कुछ पैसे कम निकल रहे थे। उन्होंने मुझसे कहा,

“पैसे का नुकसान उतना नहीं खलता, जितना यह न जानना कि गया कहाँ।“

उस दिन मैं चुपचाप घर लौटा, लेकिन वो बात मेरे साथ रह गई।

मैंने दुकानदारों को थके हुए दिन खत्म करते देखा — हाथ से कैश गिनते, स्टॉक जाँचते, और यह ढूँढते कि हिसाब कहाँ नहीं मिल रहा।

मैं अपने भविष्य के ग्राहकों को पढ़ रहा था

तब मुझे पता नहीं था, लेकिन वो साल ही मेरी असली पढ़ाई थे। कोई क्लासरूम नहीं, कोई किताब नहीं — सिर्फ़ काउंटर, शेल्फ़ और इंसान।

मैं अपने भविष्य के ग्राहकों को पढ़ रहा था।

उन काउंटरों के पीछे मैंने जो भी समस्या देखी, वही बाद में ऐसा फ़ीचर बनी जिसे मैं बनाना चाहता था:

धीमी बिलिंग
कुछ सेकंड में बनने वाला GST बिल
स्टॉक को लेकर उलझन
हर आइटम की लाइव इन्वेंटरी
हाथ से लिखे लेबल और कीमतें
बारकोड प्रिंटिंग और थर्मल प्रिंटिंग
पैसा खोने का डर
हर बिक्री, हर रुपये का साफ़ हिसाब
Retail Daddy बिलिंग सॉफ्टवेयर स्क्रीन

भारत वापसी

जब मैं भारत लौटा, तो कोई बड़ी दौलत लेकर नहीं लौटा। न बड़ी गाड़ी, न बड़ा बैंक बैलेंस। मैं बचत से भी ज़्यादा उपयोगी चीज़ लेकर लौटा।

मैं दुकानदार की समस्या को अंदर से समझकर लौटा।

केरल के कोच्चि से हमने शुरुआत की। शुरुआती दिन आसान नहीं थे। दुकानदारों को समझाना पड़ता था कि सॉफ्टवेयर उनका काम बढ़ाएगा नहीं, घटाएगा। कई लोग कहते, “हमारा रजिस्टर ही ठीक है।” लेकिन जब वो देखते कि बिल सेकंडों में बन रहा है और शाम का हिसाब अपने आप मिल रहा है, तो उनकी आँखों में वही राहत दिखती, जो मैंने विदेश में किसी मालिक की आँखों में कभी नहीं देखी थी।

बिलिंग काउंटर पर मुस्कुराता दुकानदार

इसी समझ ने Raintech Software को और बाद में Retail Daddy को आकार दिया। आज Retail Daddy भारत सरकार के ट्रेड मार्क्स रजिस्ट्री में रजिस्टर्ड ब्रांड है, और रेस्टोरेंट्स के लिए हमने Restaurant Daddy भी बनाया।

आज पूरे भारत में 1.5 लाख से ज़्यादा रिटेलर्स हमारा सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करते हैं — किराना स्टोर, सुपरमार्केट, गारमेंट्स शॉप, और कई तरह के बिज़नेस। मुझे लगता है इसकी एक वजह सीधी है: इसे ऐसे इंसान ने बनाया है जो कभी उनकी तरफ़ के काउंटर पर खड़ा रहा है।

खिड़की से बाहर देखता एक युवा

अगर आप ऐसी नौकरी में हैं जो आपने नहीं चुनी

हो सकता है आप अपनी पढ़ाई से बहुत अलग किसी जगह काम कर रहे हों। हो सकता है नौकरी छोटी लगे, या जगह घर से बहुत दूर। हो सकता है आज रात आप भी किसी छोटे कमरे में लेटे यही सोच रहे हों कि यह सब कहाँ जा रहा है।

मैं आपसे बस इतना कहूँगा: उन सालों को बेकार मत समझिए।

ध्यान से देखिए। सवाल पूछिए। लोगों की रोज़ की समस्याओं पर गौर कीजिए। जो चीज़ आज आपको परेशान करती है, वो किसी और को भी परेशान करती होगी। उन्हीं में से कोई समस्या आपका भविष्य का बिज़नेस बन सकती है।

सीख

कोई भी नौकरी बेकार नहीं जाती, अगर आप उससे सीखते रहें।

आज जो हुनर आप चुपचाप इकट्ठा कर रहे हैं, वही कल आपके बनाए हुए की नींव बन सकते हैं। मेरे लिए वो नींव विदेश के एक काउंटर के पीछे रखी गई थी। आपकी नींव शायद आज, अभी, कहीं बन रही हो।

उस इंसान का बनाया हुआ जो दुकानदार की समस्या को अंदर से समझता है।

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Retail Daddy सॉफ्टवेयर, बारकोड स्कैनर और प्रिंटर

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